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श्रीमद्भागवत कथा: धूमधाम से मनाया श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव

बुढार। (भारती जायसवाल ) बुढार हीरा कॉलोनी में नरेंद्र तिवारी के निज निवास में चल रहें संगीतमय श्रीमद् भागवत कथा में रविवार को श्रीकृष्ण जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया गया। कथा व्यास पंडित बालकृष्ण पांडे के द्वारा श्रोताओं को श्रवण कराया गया। कथा में मुख्य रूप से श्री कृष्ण जन्मोत्सव का चल चित्रण सहित उनके जीवन का परिचय और जन्म का उद्देश्य बताते हुए, उन्होंने कहा कि जिस समय भगवान कृष्ण का जन्म हुआ जेल के ताले टूट गए, पहरेदार सो गए। वासुदेव देवकी बंधनमुक्त हो गए। प्रभु की कृपा से कुछ भी असंभव नहीं है। कृपा न होने पर प्रभु मनुष्य को सभी सुखों से वंचित कर देते है। चौथे दिन रविवार को श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाया। नन्हें बालक को कृष्ण के रूप में सजाकर पंडाल में लाते ही जय कन्हैयालाल के जयकारो से गूंज उठा। भक्तों ने बाल कृष्ण को दुलार किया। साथ ही भगवान को माखन-मिश्री का भोग लगाकर आरती की गई। कथा वाचन पंडित बालकृष्ण पांडे ने श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं का वर्णन कर उनके जन्म का उद्देश्य भी बताया। भगवान का जन्म होने के बाद वासुदेव ने भरी यमुना पार करके इन्हें गोकुल पहुंचा, वहां यशोदा के यहां पैदा हुईं, शक्तिरूपा बेटी को लेकर चले आए, श्री कृष्ण जन्मोत्सव पर नंद घर आनंद भयो जय कन्हैया लाल की गीत पर एवं संगीतकारों द्वारा सुंदर भजनों की प्रस्तुति देकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया।

सुंदर झांकियों ने श्रद्धालुओं का मन मोहा
 
बता दे कि आज यानी रविवार की कथा मुख्यतः कृष्ण जन्मोत्सव को लेकर थी जहां देवकी, यशोदा, नंदबाबा, वासुदेव और बाल कृष्ण की झाकी निकली गई जिसको देख श्रद्धालु अति उत्साहित हुए, अन्य दिनों की अपेक्षा आज पंडाल श्रद्धालुओं से भरा रहा, राधे-कृष्ण के जय कारे जोर शोर से लगे।

भक्ति के स्वरूप भक्त प्रहलाद 

महाराज श्री ने कथा में प्रहलाद जी और हिरण्य कश्यप के जीवन पर कथा कहा। बताया कि किस प्रकार एक छोटा बालक भक्त बना और अपनी भक्ति से ईश्वर को अवतरित होने पर विवश कर दिया। हिरण्यकश्यप जो खुद को देव तुल्य मानता था और उसे प्रहलाद का विष्णु के प्रति भक्ति देख मानो उसके कलेजे में शर्प लोट जाता हो, हिरण्यकश्यप अहंकार के भाव में खुद के पुत्र को कई प्रकार से मारने, सताने और विष्णु भक्ति से दूर करने का प्रयास किया लेकिन वह भक्त कैसा जो अपने आराध्य को छोड़ दे। प्रहलाद की भक्ति से और उसके कष्ट को देखते हुए भगवान विष्णु स्वयं नरसिंह अवतार में आए और हिरण्य कश्यप का बध किया। महाराज श्री ने कथा के अंत में कहा सच्ची भक्ति से ही परमात्मा से मिलन के द्वार खुलते हैं।

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