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बुढ़ार का 'बेताज बादशाह': कथित भू-माफिया छोटू का जाल, सरकारी से आदिवासी जमीन तक सब 'साफ'!

शहडोल/बुढ़ार। (निर्मल जायसवाल) कोयले की काली कमाई तो सुनी होगी, पर बुढ़ार में जमीन की 'सफेद कमाई' का खेल कुछ ज्यादा ही काला हो चला है। यहां कथित भू-माफिया 'छोटू' का सिक्का इस कदर चल रहा है कि निजी जमीन तो छोटी बात, सरकारी जमीनों पर भी उसकी कलम चल जाती है। आरोप है कि राजस्व अमले की शह पर जमीनों का 'कायाकल्प' करने में माहिर छोटू ने गरीब आदिवासियों को भी नहीं बख्शा।

आदिवासी जमीन से 'मोटा मुनाफा' का खेल

स्थानीय लोगों का आरोप है कि छोटू ने कई आदिवासियों की जमीनें औने-पौने दामों पर खरीदकर ऊंचे मुनाफे पर बेच दीं। देखते ही देखते वह जमीन दलाली का 'बेताज बादशाह' बन बैठा। ग्रामीणों में चर्चा है कि जिसकी लाठी, उसकी भैंस वाली कहावत को छोटू ने 'जिसकी पहुंच और पवार, उसकी जमीन' में बदल दिया है।
छोटा पैकेट, बड़ा धमाल

बताया जा रहा है कि हाल ही में छोटू ने 'छोटा पैकेट में बड़ा धमाल' कर दिखाया। आरोप है कि उसने खरीददारों को रोड की जमीन बताकर अंदर की जमीन लाखो रुपये में बेच दी। खरीददारों ने पूरे भरोसे के साथ सौदा किया, जिस जमीन को मुख्य मार्ग पर बता कर बेचा गया है हकीकत में वह जमीन रोड़ पर है, ही नहीं। 'छोटू ने इस तरह अपने भरोसेदार को अच्छा चूना लगाया'।

सवाल के घेरे में राजस्व विभाग?
 
सबसे बड़ा सवाल यही है कि बुढ़ार के आसपास शासकीय जमीनों का निजी लोगों के नाम पर चढ़ना बिना राजस्व विभाग की मिलीभगत के कैसे संभव है? स्थानीय लोगों का कहना है कि नक्शा, खसरा, बी-1 में हेरफेर का खेल बिना अंदरूनी मदद के नामुमकिन है। 

चर्चा है कि छोटू का नेटवर्क इतना तगड़ा है कि पटवारी से लेकर ऊपर तक फाइलें 'सरक' जाती हैं। गरीब आदिवासी अपनी जमीन बचाने के लिए दफ्तरों के चक्कर काटते रह जाते हैं, जबकि कथित तौर पर छोटू के इशारे पर रातों-रात सीमांकन और नामांतरण हो जाते हैं।

प्रशासन कब जागेगा?

बुढ़ार में अब यह सवाल आम हो चला है कि आखिर इस 'बेताज बादशाह' पर नकेल कौन कसेगा? क्या राजस्व विभाग अपनी फाइलों की धूल झाड़कर देखेगा कि सरकारी जमीनें कैसे निजी हो गईं? और उन आदिवासियों का क्या, जिनकी जमीनें कथित तौर पर औने-पौने दाम पर चली गईं?

फिलहाल कौड़ियों की जमीन को लाखों में खरीदने वाले खरीददार अपने आप को ठगा महसूस कर रहे हैं, या नही। लेकिन बुढ़ार की फिजा में एक ही सवाल गूंज रहा है - 'छोटू की मनमानी पर आखिर लगाम कब?'

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