“जीवन में धर्म को प्रतिष्ठित किये बिना जीवन का उद्धार संभव ही नहीं। ”उपरोक्त उद्गार मुनि श्री प्रमाणसागर महाराज ने पंचकल्याणक महामहोत्सव के तृतीय दिवस, जन्म कल्याणक के पावन अवसर पर व्यक्त किए
शहडोल। मुनि श्री ने कहा कि जब किसी सामान्य व्यक्ति का जन्म होता है तो उसका परिवार आनंदित होता है, किंतु जब त्रिलोकीनाथ का जन्म होता है, तो तीनों लोकों में हर्ष की लहर दौड़ जाती है। क्षणभर के लिए नारकीय जीवों में भी प्रसन्नता का संचार हो जाता है। उन्होंने कहा
हम और आप अनंत बार जन्म ले चुके हैं, किंतु उन जन्मों को व्यर्थ गंवा दिया, भगवान ने भी जन्म लिया, परंतु उन्होंने अपने जन्म को सार्थक बना लिया। संतों कहते है “ जन्म लिया है तो उसे सार्थक बनाओ।”सिर्फ पढ़-लिख लेना, धन कमा लेना, पद- प्रतिष्ठा प्राप्त कर लेना या परिवार बसाना ही जन्म की सार्थकता नहीं, यह सब तो अनंत बार पाया और खोया है, जन्म की सार्थकता संयम मार्ग को अपनाने और धर्म के पथ पर चलने में है,
उन्होंने बताया कि तीर्थंकरों के जीवन में एकाद अपवाद को छोडकर प्रायः जन्म और दीक्षा की तिथि एक ही होती है, जो इस तथ्य का प्रमाण है कि जन्म की सार्थकता संसार में उलझने में नहीं, बल्कि संयम और तप में है। भगवान ने अपने पूर्व दस भवों में श्रावक धर्म का पालन किया, तत्पश्चात अंतिम तीन भवों में मुनि बनकर कठोर साधना की और परम लक्ष्य प्राप्त किया।
मुनिश्री ने कहा कि सभी तीर्थंकर चक्रवर्ती सम्राट रहे, वैभव की कोई कमी नहीं रही, फिर भी उन्होंने सर्वस्व का त्याग किया, धर्म वह कर पाता है जिसके भीतर आत्मकल्याण की भावना हो। उन्होंने मनुष्य जन्म की दुर्लभता का वर्णन करते हुए कहा कि चार लाख चौरासी हजार योनियों में यह नरभव अत्यंत कठिनाई से प्राप्त होता है। हमें मनुष्य जन्म के साथ उत्तम संस्कार, श्रेष्ठ परिवार और देव-शास्त्र-गुरु का सान्निध्य प्राप्त हुआ है, फिर भी जीवन में भटकाव है तो इससे बड़ा दूसरा कोई दुर्भाग्य नहीं?
उन्होंने प्रेरित किया कि दान, पूजा, शील और उपवास को जीवन का अंग बनाइए, यदि भगवान को पाना है तो उनकी वाणी को मानना होगा। व्यसन और बुराइयों से स्वयं को मुक्त करना होगा।उन्होंने कुलाचार की बात करते हुये कहा कि इसे निभा सकें तो अच्छी बात है,यदि न निभा सकें,तो कम से कम दुराचार से अवश्य बचें,आप धर्म करें या न करें, पर अधर्म से बचें,यही सबसे बड़ा धर्म है।” युवाओं के लिए विशेष संदेश देते हुयेमुनिश्री ने कहा कि- विकृत जीवनशैली के कारण युवाओं का तेज क्षीण हो रहा है। जहाँ प्रतिभा प्रकट होनी चाहिए, वहाँ व्यसन और बुराइयों की कालिमा छा रही है। युवाओं से आह्वान करते हुए संयम, सदाचार और सकारात्मक जीवनशैली अपनाने का संदेश दिया। जन्म कल्याणक का सार बताते हुए उन्होंने कहा —
मनुष्य जन्म दुर्लभ है, इसे पहचानो, संयम ही जीवन की सार्थकता है, इसे अपनाओ।
देव, शास्त्र और गुरु का सान्निध्य महान सौभाग्य से मिलता है, अतः अपने आपको अधर्म से बचाओ यही सबसे बड़ा धर्म है।उन्होंने उपस्थित जनसमूह को भाग्यशाली बताते हुए कहा कि धर्म का ऐसा वातावरण मिलना अत्यंत बहूत दुर्लभ है, मनुष्य जन्म भोग-विलास या केवल धनार्जन के लिए नहीं, बल्कि संसार-सागर से पार होने के लिए प्राप्त हुआ है, इसका उपयोग करो इस अवसर पर मुनि श्री प्रसाद सागर जी, मुनि श्री शीतलसागर जी, मुनि श्री संधानसागर जी तथा क्षु. श्री समादर सागर महाराज मंचासीन रहे। कार्यक्रम का संचालन बाल ब्रह्मचारी अशोक भैया एवं अभय भैया ने किया। मुनि संघ के प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी एवं स्थानीय मीडिया प्रभारी प्रसन्न जैन ‘दीपू’ ने जानकारी देते हुए बताया कि प्रातः 6 बजे से पंचकल्याणक के मांगलिक कार्यक्रम प्रारंभ हुए। भगवान का अभिषेक एवं मुनिश्री के मुखारविंद से शांतिमंत्रों के साथ शांतिधारा संपन्न हुई। तत्पश्चात नित्यनियम पूजन एवं जन्म कल्याणक की क्रियाएँ सम्पन्न की गईं।
बालक के जन्मोत्सव की खुशी में पात्र बने माता-पिता, सौधर्म इंद्र एवं अन्य प्रमुख पात्रों ने जीवदया हेतु गौशाला में दान देकर पुण्यार्जन किया। दोपहर में जन्माभिषेक का भव्य जुलूस निकला, जिसमें ऐरावत हाथी पर बालक आदिकुमार को सौधर्म इंद्र एवं शचि इंद्राणी की गोद में विराजमान कर निकाला गया। पांडुक शिला पर पहुँचकर 1008 रत्नमयी कलशों से बालक आदिकुमार का जन्माभिषेक संपन्न हुआ।
संध्याकालीन आरती के पश्चात राजा नाभिराय का दरबार सजा, जिसमें तांडव नृत्य, बालक आदिकुमार का पालना एवं बाल क्रीड़ाओं के मनोहारी दृश्य प्रस्तुत किए गए।
28 फरवरी को होंगे ये आयोजन
28 फरवरी, शनिवार को युवराज का राज्याभिषेक, राज्य संचालन, षट्कर्म, शिक्षा एवं दंड व्यवस्था के दृश्य, नीलांजना का नृत्य, वैराग्य के क्षण तथा मुनि दीक्षा धारण कर वन गमन के भावपूर्ण प्रसंगों का मंचन किया जाएगा।
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